“Quick commerce apps जैसे Blinkit, Zepto हमारी ज़रूरतों को नहीं, अब हमारी इच्छाओं को पूरा कर रहे हैं। क्या हम सुविधा के नाम पर धैर्य और संतुलन खो रहे हैं?”
आज सुबह एक अजीब सी चीज़ हुई…मेरे पड़ोसी ने Blinkit से लिपस्टिक ऑर्डर की — और वो 9 मिनट में आ गई।अब बात सिर्फ गति (speed) की नहीं है…
बात है —सुविधा(convenience) कितनी आगे बढ़ चुकी है।Quick Commerce apps, जो कभी दूध, ब्रेड और दवाई जैसी ज़रूरी चीज़ों के लिए बने थे — अब iPhone, जूते, स्किनकेयर, यहां तक कि फ़र्नीचर तक दे रहे हैं… 10 मिनट में!पहले हम बाहर जाते थे, दुकानों में वक़्त बिताते थे, कुछ सोचते थे।
अब?
हमने बाहर निकलना छोड़ दिया है।हमने इंतज़ार करना छोड़ दिया है।
हमने धैर्य रखना बंद कर दिया है।—Quick Commerce हमारी आदतों को तेज़ी से बदल रहा है:
1. यह हमें आवेगी बना रहा है— हमने सोचना छोड़ दिया, बस क्लिक कर देते हैं।
2. यह लोकल दुकानों की ज़रूरत को खत्म कर रहा है— न नुक्कड़ वाला किराना बचा, न रिश्तों वाला संवाद।
3. यह ज़रूरत से ज़्यादा ज़रूरत पैदा कर रहा है— चीज़ें चाहिए नहीं होती, फिर भी हम ले लेते हैं।—सुविधा के नाम पर क्या हम खुद को खो रहे हैं?हाँ, ये सब बहुत आसान लगता है।लेकिन यही आसानी धीरे-धीरे लत बन जाती है।अब Quick Commerce हमारी ज़रूरतों नहीं, हमारी इच्छाओं पर चल रहा है।और इच्छाएं कभी खत्म नहीं होतीं…—तो अगली बार…जब भी तुम 10 मिनट में कोई non-essential चीज़ मंगवाने की सोचो—रुको।साँस लो।सोचो — क्या ये सच में ज़रूरी है?
शायद बाहर निकलो, कुछ देर walk करो, और अपने मन से पूछो —”क्या मैं convenience का शिकार हो रहा हूँ?”—एक आख़िरी बात…सुविधा अच्छी है, लेकिन अगर वो हमें असंवेदनशील और अधीर बना दे — तो फिर क्या ये वाक़ई सुविधा है?शायद, कुछ चीज़ों में देर होना ही ज़िंदगी की खूबसूरती है…
